भगवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 1 – भगवान कृष्ण का दिव्य उपदेश
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श्रीभगवानुवाच |
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वच: |
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥
श्लोक का अर्थ:
श्रीकृष्ण ने कहा – हे महाबाहो अर्जुन! पुनः मेरा परम वचन सुनो, जिसे मैं तुम्हारे प्रति प्रेम और तुम्हारे हित की कामना से कह रहा हूँ।
व्याख्या:
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को पुनः दिव्य ज्ञान प्रदान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यहाँ "परमं वचः" का अर्थ है सर्वोच्च और दिव्य ज्ञान। अर्जुन को यह ज्ञान इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि वे प्रेमपूर्वक सुनने के इच्छुक हैं और भगवान उनका हित चाहते हैं।
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बताना चाहते हैं कि वे अब अपने ईश्वरीय ऐश्वर्य, दिव्य शक्तियों और स्वरूप के बारे में विस्तार से समझाने जा रहे हैं। इस अध्याय को "विभूति योग" कहा जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (अर्थात् अद्भुत शक्तियों) का वर्णन करते हैं।
हमारे जीवन में इस श्लोक का महत्व:
सच्चे ज्ञान की प्राप्ति तभी होती है जब हम श्रद्धा और प्रेम से सुनने के लिए तैयार होते हैं।
भगवान हमें वह ज्ञान देते हैं जो हमारे हित में होता है।
हमें अपने जीवन में भगवान के मार्गदर्शन को प्रेमपूर्वक और ध्यान से सुनना चाहिए।
निष्कर्ष:
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जब कोई सच्चे हृदय से ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयार होता है, तो भगवान स्वयं उसे उपदेश देते हैं। हमें भी श्रद्धा और प्रेमपूर्वक भगवद्गीता का अध्ययन करना चाहिए ताकि हम अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकें।
हरि ॐ!
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भगवद्गीता श्लोक अर्थ सहित
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